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कविता - कुछ ऐसा जीवन हो (contest)

Posted On: 22 Jan, 2014 Contest में

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कुछ ऐसा जीवन हो

उषा में विहगों के गायन से नींद खुले
रवि -किरणों से नित नव स्फूर्ति मिले
संध्या की नीरवता तन में अलस जगाए
सुन्दर स्वप्नों की नींद निशा में आए
स्वच्छ समीर से प्रफुल्ल तन -मन हो
कुछ ऐसा जीवन हो .

वर्षा में वारिद झम -झम बरस भिगाए
कोकिल वसंत में मधुर तान सुनाए
शीतऋतु में नरम धूप की ऊष्णता
शरद निशा में शशिकिरणों की सुन्दरता
प्रकृति के विविध रूपों का अभिन्दन हो
कुछ ऐसा जीवन हो .

हरित द्रुमों पर अभय पंछियों का घर
अरण्य में निर्भीक विचर सकें वनचर
निष्ठुर व्याधों के न कुलिश तीर चले
कोई न जिए भय -आशंका के भाव तले
अनुराग -उल्लास भरा कण -कण हो
कुछ ऐसा जीवन हो .

द्वेष , कुटिलता से जीवन न हो दूषित
कपट , प्रवंचना से न होना पड़े व्यथित
सुन्दर गीत सरलता -समता के बजते हों
परमार्थ के भाव स्वार्थ को पराभूत करते हों
जटिल नियम और पाखंडों का न बंधन हो
कुछ ऐसा जीवन हो .

न विजय का दंभ , न कचोट पराजय की
मानव समाज में धारा बहे समन्वय की
विकास के लिए न हो प्रकृति का अति दोहन
इच्छाएँ असीम , किन्तु करे मनुज नियंत्रण
समरसता के सन्देश से भरा हर क्षण हो
कुछ ऐसा जीवन हो .



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anuj Diwakar के द्वारा
January 30, 2014

बेहद सुन्दर रचना…

    vikaskumar के द्वारा
    January 31, 2014

     रचना अच्छी लगी ,धन्यवाद .

ranjanagupta के द्वारा
January 27, 2014

विकास जी !अच्छा प्रयास और उत्तम भाव !बधाई !

    vikaskumar के द्वारा
    January 27, 2014

    रंजना जी ,धन्यवाद .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 23, 2014

सुन्दर भावनाएं व कामनाएं भी सुंदर ! विकास जी बधाई !

    vikaskumar के द्वारा
    January 24, 2014

     धन्यवाद , आचार्य जी .

Ravindra K Kapoor के द्वारा
January 22, 2014

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति और कल्पना. काश ऐसा हो सकता. सुभकामनाओं के साथ ..रवीन्द्र के कपूर

    vikaskumar के द्वारा
    January 23, 2014

     धन्यवाद रवींद्रजी .


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